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नदी की पुनर्स्थापना यानि जीवन की पुनर्रचना


आखिरी बार आपने अरपा को पानी से लबालब भरा कब देखा था? यह वाकई बहुत पहले की बात है, सही कहा ना?

आज, पूरे देश में नदियाँ सूख रही हैं और पानी लगातार दिन ब दिन प्रदूषित होता जा रहा है

मुख्यतः देश में दो प्रकार की नदियाँ बहती हैं, एक जिनका उद्गम पहाड़ों पर है, दूसरी जो धरती से निकलती हैं। शहरी क्षेत्रों में आज की सबसे बड़ी समस्या भूगर्भीय जलस्तर का लगातार गिरते जाना है। भारतीय नदियाँ व्यापक रूप से वर्षा पर निर्भर हैं। वर्षाजल मिट्टी से रिसकर धरती के अंदर चला जाता है और भूगर्भीय जल के रूप में संरक्षित रहता है। यह धीरे-धीरे ज़मीन के नीचे बहता है और जलधाराओं, नदियों आदि में प्रवेश करता है। आज सबसे बड़ी चिंता का विषय है कि ज़मीन से निकलने वाली नदियाँ सूखती जा रही है। ऐसी हालत सहायक नदियों और मुख्य नदियों की शाखाओं की है। हालांकि वो नदियाँ जिनका उद्गम पर्वत हैं, स्वयं को बचाए हुए है। लेकिन अधिकांश नदियाँ जो धरती से उत्पन्न हुई हैं, शहरी विकास और वृद्धि के दबाव को झेल नहीं पाईं, अरपा भी इसका अपवाद नहीं है।

बिलासपुर छत्तीसगढ़ राज्य का दूसरा सबसे बड़ा शहर है और अरपा इस जिले की जीवनरेखा है। अरपा छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी- शिवनाथ की प्रमुख सहायक नदी है। अरपा नदी का उद्गम खोंडरी-खोंगसरा के हरे- भरे वनों के बीच है, अरपा बिलासपुर जैसे शहर के ईकोसिस्टम में जीवन का प्रमुख स्रोत है, वो जीवन जो नदी के किनारों पर पनपता है। अरपा नदी सिर्फ पानी का स्रोत ही नहीं बल्कि परिवहन का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है। साथ ही यह नदी वनस्पति और जीवों के लिये एक बड़े ईकोसिस्टम का निर्माण करती है। हालांकि, अरपा का पानी सूखने से शहरी ईकोसिस्टम पर बहुत बुराव विपरीत असर हुआ है।शहरी ईकोसिस्टम में संसाधनों का जितना भी दोहन किया जाये कम लगता है, यही वजह है कि अनियंत्रित दोहन से प्राकृतिक संसाधनों में भारी कमी आ गई है। स्वाभाविक है कि सूखी नदी संसाधनों पर दबाव को झेल नहीं सकती और इसका पतन आरंभ हो जाता है।

आइए इस समस्या पर एक-एक करके बात करते हैं।

अरपा नदी पर 10 से ज़्यादा बाँध(खोंडरी, बेलगहना, लछनपुर, रपता, तोरवा, दर्रीघट, शेरवानी, कनेरी, मंगला आदि) बनाए गये हैं। सिंचाई की समस्या के निदान व मानव-कल्याण के लिये तब इन बाँधों की बहुत ज़रूरत थी। लेकिन पिछले पाँच वर्षों से लगातार जलस्तर में कमी के कारण नदी में संचित पानी भी दिन ब दिन घटता जा रहा है। इस वजह से यह चेक डैम इस क्षेत्र में आजीविका के लिये खतरा बन गए हैं। वर्षाजल का अधिकांश भाग चैक डैम में संचित होता है, जो लोगों द्वारा इस्तेमाल कर लिया जाता है। इसके अतिरिक्त अरपा नदी की घाटी के चारों तरफ बिलासपुर के पास जंगलों की कटाई से प्रदूषण में वृद्धि हुई है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ कि पर्यावरण अस्थिर हो गया है।

दूसरे, शहर का सारा कचरा ज्यों का त्यों बिना वेस्ट मैनेजमेंट के बहकर नदी में जमा हो रहा है, इससे साफ पानी प्रदूषित होने लगा है। नदियाँ सिर्फ सिंचाई और यंत्रीकरण का स्रोत नहीं है। बल्कि नदी के किनारे व घाटियों में बसी मानव सभ्यता के लिये पीने के साफ पानी का प्रमुख स्रोत भी है। लेकिन यह डर बना हुआ कि निरंतर कचरों के बहकर नदी में जमा होने से प्रदूषण बढ़ता रहेगा। और एक समय ऐसा आएगा कि प्रदूषण के कारण नदी का पानी हमेशा के लिये अनुपयोगी हो जाएगा।

यह सुनने में भयानक और फिक्र करने वाली बात लगती है ना? खैर, यह परिस्थिति हमेशा नहीं रहने वाली। अतीत में संसाधनों के अनियंत्रित दोहन और बहुत कम क्षतिपूर्ति से हमारे पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुँचा है। नुकसान तेज़ी से हुआ है, पुनर्स्थापना को अपना असर दिखाने में दशकों लग जाएंगे।

इसलिये, हाल के वर्षों में, नदी की पुनर्स्थापना के लिये किये गये प्रयासों से विश्व की कई नदियों को नया जीवन मिला है। एक सरकारी अध्ययन के अनुसार, यदि बचाव के लिये ज़रूरी कदम नहीं उठाए गए तो अगले 15 वर्षों में जीने के लिये जितने पानी की ज़रूरत होती है, भारत में उसका आधा रह जाएगा। हमारे सामने पानी की गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाएगी। पर्वत और पहाडियों से निकलने वाली छोटी जलधाराओ से नदियों को पानी मिलता है। यह जलधाराएँ भी सिकुड़ने लगी हैं। इसलिए, हम सबको मिलकर अपनी नदियों को बचाने के लिये सामूहिक प्रयास करने चाहिये।

तो, अरपा नदी के लिये चीज़ें कैसे बेहतर हो सकती हैं?

नदी को बचाने के दो उपाय हैं – एक पेड़ लगाना दूसरा चैकडैम बनवाना ताकि बरसात के पानी को रोका जा सके।

ऐसा ही एक प्रयोग बिलासपुर अरपा नदी में भी किया गया है। नदी में कुछ चैकडैम बने, जिससे आगे की ज़मीन सूख गई अब ज़रूरत है एनीकट बनाने और नदी के दोनों किनारों पर पेड़ लगाने की। आमतौर पर जो शहरी नदियाँ हैं उसमें फैक्टरी का कचरा, निगम के नाले का पानी जाता है। यदि अरपा के जल का शुद्धिकरण नहीं किया गया और पानी नहीं रोका गया तो जलस्तर नीचे जाएगा। उसके लिये अरपा का प्राधिकरण बनाया गया। जिसका उद्देश्य है कि अरपा के पानी को शुद्ध करना, जलस्तर मेन्टेन करते हुए बारहों महीने पानी रखना और भूगर्भीय जल को बचाना।

अरपा नदी के किनारे, घाटियों में नियमित सघन वृक्षारोपण अभियान चलाया गया है, ताकि नदी की मिट्टी के कटाव को रोका जा सके। पेड़ की जड़ें मिट्टी को छेददार बना देती हैं जिससे ज़मीन बारिश का पानी सोख कर उसे थाम कर रखती है। यह जल साल भर धीरे-धीरे नदी में मिलता रहता है।

अरपा नदी घाटियों के प्रभावी तरीके से विकास हेतु पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के आधार पर एक स्पेशल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (साडा) का गठन किया गया है। नदी घाटियों के 653 हेक्टेयर क्षेत्र का विकास साडा का लक्ष्य है। इन क्षेत्रों में व्यावसायिक, रिहाइशी, मनोरंजन और अन्य सांस्थानिक सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा। नदी के दोनों तरफ- पुल, सड़कों और फुटपाथों के अलावा 13.4 किमी लम्बी दीवार, घर और व्यावसायिक परिसरों का निर्माण किया जाएगा। इन क्षेत्रों में जल आपूर्ति, सीवरेज, ड्रेनेज, विद्युत आपूर्ति की समुचित व्यवस्था की जाएगी।

इन सबके अलावा आज की ज़रूरत के अनुसार मौजूदा सीवरेज परिवहन प्रणाली को अपग्रेड किया गया है। क्योंकि कचरा एनटीपीसी के वाटर-ट्रीटमेंट के बाद की प्रक्रिया में शहर के नालों से प्रवाहित होकर अरपा नदी में समाहित हो जाता है।

बिलासपुर जैसा शहर उस जलप्रणाली का एक छोटा सा हिस्सा है जिसे ‘शहरी नदियाँ’ कहा जाता है। ये शहरी नदियाँ वो खंड हैं, जो सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं, जिन्हें पुनर्स्थापना प्रक्रिया का लाभ दिया जाना। अब समय आ गया है कि पूरे शहरी नदी और इसके जलग्रहण क्षेत्र में बड़े पैमाने पर, और भी ज़्यादा केन्द्रित एवं सामूहिक प्रयास किया जाए। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोग सबसे बड़ी संपत्ति हैं, जिनकी मदद से इस महान नदी की सफल पुनर्स्थापना की जा सकती है। अलग-अलग निकाय नदी की पुनर्स्थापाना के लिये कार्य कर रहे हैं, आम जनता के साथ आकर सहभागिता निभाने से इन प्रयासों में सच्ची सफलता हासिल होगी। अलग-अलग एनजीओ, प्राइवेट बॉडी के साथ-साथ विभिन्न सरकारी पहल के माध्यम से अरपा नदी की पुनर्स्थापना प्रक्रिया का सफल क्रियान्वयन किया जा रहा है। नदी व इसके ईकोसिस्टम में धीमी किन्तु सटीक लगातार सुधार के लिये यह संस्थाएँ उत्तरदायी रही हैं। जब अलग-अलग निकाय नदी की पुनर्स्थापाना के लिये कार्य कर रहे हैं, आम जनता के साथ आकर सहभागिता निभाने से इन प्रयासों में सच्ची सफलता हासिल होगी।

अब राज्य प्रशासन को चाहिये कि नदी की पुनर्स्थापना की सामूहिक पहल का नेतृत्व प्रभार लें। इससे वे सभी निकाय एक साथ आ जाएंगे जो नदी को पुनर्जीवित करने के लिये अलग-अलग प्रयास कर रहे हैं। इससे अरपा नदी घाटियों में पहले से चल रहे आधारभूत कार्यों में भी तेज़ी आ जाएगी।

 



    2019-07-02 10:09:07



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